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विज्ञापन की मशहूरी

विज्ञापन आम जनता में पहुँच बनाने के लिए बनाये जाते हैं। विज्ञापनों की दुनिया उतनी ही पुरानी है जितनी पत्रिकाएं। पत्रिकाओं, समाचार पत्रों और टेलीविज़न से बाहर झांकते यह विज्ञापन हमारे बचपन में ‘मशहूरी’ के नाम से जाने जाते थे। अधिक पब्लिक स्कूल खुल जाने से हमारा अंग्रेजी ज्ञान बढ़ा। नाम परिवर्तन प्रक्रिया के कारण ‘मशहूरियाँ’ ‘ऐडज़ ‘ बन गयीं। महाभारत में श्री कृष्ण के शंख की ध्वनि का समय सवा नौ बजे हुआ करता था। इससे पूर्व पंद्रह मिनट की मशहूरियों या ऐडज़ में रिन वाली आंटी जी की चमक और लिज़्ज़त पापड़ का स्वाद महाभारत तक बांधे रखता।

तीस सेकंड की ऐडज़ कई कई मिनटों की हो गयी। सोशल मीडिया के ज़माने में मोबाइल फ़ोन ने टेलीविज़न का वर्क लोड कम कर दिया। फ्री में फेसबुक की सुविधा दे कर भी ज़ुकर भिया जी अमीर बन गए। फेसबुक मशहूर हुई तो इस पर आने वाली मशहूरियाँ भी मशहूर हो गयीं। अब आलम यह है कि ऐडज़ मनोरंजन एवं टाइम पास का जरिया भी बन गयीं हैं।

विज्ञापन लोगों को छूते हैं। अच्छा बन पड़े तो दिल को भी छू जाते हैं। एक ऐसा ही विज्ञापन मिला। देखिएगा जरूर!

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