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सूरज के साथ साथ

क़िस्सा यह भी सही रहा। सूरज के साथ कॉम्पटिशन कर बैठे। विपरीत दिशा में बह निकले। सूरज भिया जी ठहरे सूरज! जहूँ निकले, चारों ओर उजाला। हम तो कभी शाम से कभी अंधेरे से परिचय पाते आगे बढ़ रहे थे। सोचा न था कि पीछे मुड़ कर देखेंगे मगर देख ही लिया। अब साफ़ समझ आ गया। सूरज तो सूरज है। बेशक शाम कर देता है मगर एक रंगीन सी। रक्त-पीत्त वर्ण युक्त आसमान गवाही देता है उसके सूरज होने का। क्या अभिमान करता है यह सूरज? शायद नहीं। आगे बढ़ता जाता है पीछे कुछ बेमिसाल से नज़ारे छोड़ कर।

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