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‘शुभ शिक्षा’ की ‘विदाई’

‘प्राचीन भारत’ की शादी में विदाई के दिन दुल्हन के आँगन में आयोजित धाम में सर्वप्रथम बारातियों का हक़ हुआ करता था। आँगन में गड़ी वेद की चार टहनियों के बीच में दूल्हे एवं निकट संबंधियों के लिए आम चटाई से हट कर एक दरी और उस पर करीने से सजे कुछ कुशन! लम्बे स्टील के ग्लासों पर टेढ़ा मेढा उकेरा गया बर्तन कमेटी का नाम! तभी पाउडर लगा कर गोरी हुयी, बेहद संजीदा एक लड़की घर की चौखट पर एक बड़ा सा फोटो फ्रेम लिए अवतरित हुआ करती। यह लड़की कोई साधारण नहीं अपितु दुल्हन की विशेष सखियों में से विशेष हुआ करती। कांपते हुए हाथों से फोटो फ्रेम के अंदर मढ़े हुए चार्ट पेपर से पढ़ना शुरू करती। अमूमन यह चार्ट हस्त लिखित होता और साथ में हाथ से उकेरे गए कुछ बेल पत्तियों के डिज़ाइन। यह ‘शुभ शिक्षा’ विदा होती बेटी के लिए कुछ संस्कार देने हेतु होती। अटकती सांसों के साथ सिंथोल पाउडर से सनी लड़की पूरी ‘शुभ शिक्षा’ पढ़ देती जिसके अंश इस प्रकार होते:
“है अज़ब रीत संसार दी,
आप ने ही पालना और आप ने ही बिछोड देना;
पालना प्यार दे नाल,
फेर जिधर चाहे उधर मोड़ देना! “
जब तक ‘शुभ शिक्षा’ समाप्त न हो, कोई भोजन नहीं शुरू करता था। ‘शुभ शिक्षा’ समाप्त होने पर दूल्हे के करीबी रिश्तेदार ‘शुभ शिक्षा’ पढ़ने वाली लड़की को कुछ पैसे देकर उत्साहित करते। यह भी एक कारण था कि दुल्हन की सहेलियां अक्सर शादी से दो दिन पहले उलझ बैठती थी।
खैर! शादियां अब विला, रिसॉर्ट्स या पैलेस में हो रही हैं। घर का आँगन सूना ही रहेगा! न धाम सजेगी, न शहनाई बजेगी और न ही ‘शुभ शिक्षा’ पढ़ी जाएगी! डुप्लेक्स या विला टाइप घर शादी त्यौहार के काम नहीं आते। यह बड़े बड़े घर काम आते हैं तो बस बिमारी के समय या फिर अंत में गरुड़ पुराण पढ़ने के लिए
दूल्हे के लिए भी ‘सेहरा’ पढ़ा जाता था। बाद में चर्चा की जाएगी।।

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