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शुभ मंगल सावधान!

आज एक भस्सड़ हुयी। कुछ पुराने अजीज मित्रों से अचानक ही मुलाकात हो गयी। चेहरे पर ख़ुशी का नूर महसूस किया जा सकता था। बीच राह में कुछ पुराने किस्से साँझा किये गए। बातें कुछ इस कदर बढ़ती गयीं कि कहना ही पड़ा ‘चलो! एक-एक चाय हो जाये!’ लोचा भाई के टी-स्टाल से बेहतर विकल्प नहीं लगा जहाँ आराम से हंसी-ठठा हो सके। बात-दर-बात बढ़ती गयी। ऊपर से लोचा भाई का व्याख्यान! सब ठीक चल रहा था। कांच के धारीदार गिलासों में चाय सेवन हेतु प्रस्तुत की जा चुकी थी। पारले-जी का छोटू पैक खुल गया। कुछ मित्र चबा रहे थे, कुछ डुबो रहे थे। हम भी चबा ही रहे थे कि अचानक डुबोने का आईडिया आया। लिया एक बिस्किट और डुबो डाला। प्रैक्टिस न थी शायद। डुबो तो दिए मगर निकालने में देर हो गयी। बस! पौन बिस्किट चाय में और एक चौथ हाथ में धरा का धरा! सबकी नज़रें जमी थी। खिसिया गए! अचानक एक फिल्म की याद आ गयी। अब चाय कौन पी सकता था भला? धीरे से गिलास सरका दिए दो इंच! यूँ लगा कि ‘अली बाबा’ ढेर हो लिए।

अभी बीच रास्ते में अनजान नंबर का फ़ोन उठा लिया।

‘हेलो! आई ऍम स्पीकिंग फ्रॉम जिगलो एंटरटेनमेंट क्लब! आर यू इंटरेस्टेड?’

‘न बहन,माफ़ कर !’ मैंने भी झट से फ़ोन काट दिया।

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