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स्कूटर के पैर

एक दौड़ का धावक कभी पीछे भी छूट जाता है. क़दमों से जो लिपट जाये बवंडर दौड़ने की लय भूल जाता है. खुद खरीदे सौदे खुद के वजूद में दाखिल हो कर जब बहुत कीमती प्रतीत होते हैं. तब हम भयभीत होते हैं. कदम भारी भरकम; बोझ शरीर का नहीं आत्मा का होता हैं. बस, तभी धावक रोता हैं. मशीन का बना स्कूटर खड़ा हैं आज दीवार के सहारे. यूँ लगता है कि कदम ही भारी नहीं होते, टायर भी भारी हो जाते हैं.

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