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सरणू की सेवियां-बूंदी

मिठाईयों ने रंग-रूप बदल लिए हैं। मिठास की विलासिता उच्चतम शिखर पर है। लड्डू राजा अब मोतीचूर का परिधान ओढ़े बैठे हैं। सबसे बिगड़ैल हुआ कोई तो बर्फी! कितनी केटेगरी में सजी पड़ी हैं! चॉकलेट से लेकर पान और मूंग दाल से लेकर काजू को सम्माहित कर बैठीं हैं। गुलाब जामुन और रसगुल्ले के रंग-रूप में विशेष अंतर न हुआ। मुये बिलकुल विपरीत एक दुसरे से! अनेकों थाल सजा बैठे हलवाई अपनी अपनी पीठ बजाते हैं। कोई अपने कलाकंद पर इतराता है तो कोई मिल्क केक को उच्चकोटि का मानता है। पहले ‘सरणू हलवाई’ की दूकान हुआ करती थी। बेटा दसवीं पढ़ कर दूकान पर बैठा। दूकान का नाम ‘सरणू मिष्ठान भंडार’ हो गया। बेटे का बेटा अभी अभी इंजीनियरिंग कर के वापिस लौटा है। सुना है दूकान का नाम बदलने वाला है। ‘सरणू स्वीट्स एंड बेकर्स’ ! सब हटा दिया, बस सरणू न हटा सके। नाम बदल गए, मिठाईयां बदल गयी। अब यह सेविआ-बूंदी ही ले लीजिये। सरणू जी बनाते थे तो जायका ही कुछ ओर था। चाय के साथ मुठी भर फांक लिया करते थे। मेहमान के झोले में सेविआ-बूंदी न रही तो मेहमान कैसा? अपने आस्तित्व की आखिरी लड़ाई जारी रखे हैं बेचारी दोनों बहनें। सतपाल जी शायद अभी इनका दर्द समझते हैं। मगर सुना है सतपाल जी का बेटा भी दसवीं में पहुंच गया है!

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