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कृतघ्न

मम्मी के बगल वाले बिस्तर पर आंटी जी टाइफाइड से पीड़ित थीं।  तीमारदार अंकल जी रात भर वहीँ ठहरते, सुबह घर जाते। दस बजे तक वापिस आ जाते। दोपहर में घर जाते, वापिस अस्पताल आते। शाम को फिर निकलते और रात फूटते ही खाने का डिब्बा लिए वापिस ड्यूटी पर तैनात हो जाते। मम्मी के फेफड़ों में संक्रमण था।  डॉक्टर के अनुसार अभी ठीक होने में समय लगना था। बच्चों को स्कूल भेज और मुझे ऑफिस भेज कर मेरी धर्म पत्नी संध्या अस्पताल पहुँच जाती।  सुबह का नाश्ता और दोपहर का खाना भी साथ ले आती। ऑफिस से छुट्टी के बाद मैं रात का खाना लेकर अस्पताल पहुँच जाता। सरकारी सिविल अस्पताल में सब सही था सिवाय पार्किंग के। गाडी खड़ी करने की जगह कम होने से अमूमन इंतज़ार करना पड़ता था।  उस दिन तो हद हो गयी थी।  दो घंटे के इंतज़ार बाद गाडी खड़ी करने की जगह मिली।  मम्मी घर का ही खाना खाते थे सो देर तक भूखे रहे। अभी टिफिन समेट कर बैठे ही थे कि बगल वाले अंकल जी दौड़ते हुए आये।

“बेटा! एक कष्ट देना चाहता हूँ अगर आप …”

“अरे कष्ट कैसा अंकल? आप निसंकोच कहिये। ” मैंने भी शिष्टता का परिचय देते हुए कहा।

“बेटा ! मेरी कार स्टार्ट नहीं हो रही। घर से खाना लाना था।  क्या आप मेरे घर से खाने का डिब्बा ला सकते हो?” अंकल जी ने कांपते हुए हाथों को जोड़ कर कहा।

हामी भर दी गयी।  मगर मन में बस एक ही सवाल था: “क्या अब पार्किंग के लिए जगह मिल पायेगी?” सीधे स्पाट न सही, टेढ़े मेढ़े तरीके से अंकल जी को समस्या से अवगत करवा दिया गया। अंकल जी साथ कार में बैठे और घर से खाने का डिब्बा ले कर साथ ही निकल आये।  रास्ते में यूँ ही पूछने पर पता चला कि घर में खाना नौकरानी बनाती है। बहु बेटा विदेश में हैं। अस्पताल आ कर उसी पार्किंग समस्या से दो चार होना पड़ा। अंकल जी खाने का डिब्बा लेकर मरीज़ के पास पहुँच चुके थे। मगर मैं…..

वार्ड में पहुँचते ही अंकल जी पुनः आभार व्यक्त करने में जुट गए।

आंटी जी को स्वस्थ होने पर छुट्टी मिल गयी थी।  मगर हमारा अस्पताल प्रवास अभी शेष था।  मैं रोज़ाना छुट्टी के उपरांत अस्पताल पहुँच जाता।  जैसे ही मैं अस्पताल की पार्किंग में दाखिल होता, एक मारुती कार बाहर निकलती और मुझे अपनी कार खड़ी करने के लिए जगह मिल जाती।  सिलसिला जारी था। एक दिन ऐसे ही उस कार में जाना पहचाना चेहरा नज़र आ गया।  वही अंकल जी? यह क्या करते होंगे यहाँ रोज़ रोज़? आंटी जी को तो कब से छुट्टी मिल गयी थी।  संध्या से पूछने पर पता चला कि अंकल रोज़ाना चार बजे मम्मी का हाल चाल पूछने आते हैं।

“चार बजे? यहाँ से तो सात बजे निकलते है!” मैंने मन ही मन सवाल किया।

अगले दिन शंका के समाधान हेतु अंकल जी की कार को रोक लिया। वास्तविकता पूछने पर जवाब मिला।

“पेंशनर हूँ।  टाइम पास करने आ जाता हूँ। बहिन जी का हाल चाल भी पूछ लेता हूँ।  और हाँ! अब पार्किंग की समस्या तो नहीं है न?”

“कैसे होगी अंकल! आप ने होने ही न दी। ” मैं चाह कर भी यह शब्द बोल न पाया।

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