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इंडिया टुडे?

शब्द अब उड़ने लगे हैं। पहले भी उड़ते थे शायद जब कालिदास के ‘मेघदूतम’ का यक्ष मेघों के माध्यम से अपनी प्रेयसी को सन्देश भेजा करता था। शब्द फिर चलने लगे थे। दिल्ली, मुंबई के प्रकाशन घरों से छप कर पत्र-पत्रिकाएं रेलगाड़ियों और बसों से मीलों सफर तय कर बुक-स्टाल तक पहुंचती थीं। ताजा-तरीन खरीदी हुयी पत्रिका की खुशबु विशेष अनुभूति प्रदान करती। अब उस खुशबु से परिचय नहीं रहा। अब शब्द www के हवाई जहाज पर उड़ कर हमारे पास पहुँचते हैं। कागज पर उकेरे जाने वाले शब्द अब ‘टेम्पर्ड ग्लास’ से बहार झांकते हैं। पन्ने पलटे नहीं, स्क्रॉल किये जाते हैं। बस-स्टैंड का बुक-स्टाल अब पत्रिकाएं नहीं, इयर फ़ोन बेचता है। एक स्टाल दिखा। पत्रिकाएं कम दिखीं। फोटो खींच ली है। सोशल मीडिया पर चिपकाएंगे। प्रिंट मीडिया पर तो शायद मुमकिन न हो।

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