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स्त्री का रुमाल छोटा क्यों?




आज यूँ ही कहीं बैठे बैठे एक अधेड़ उम्र की महिला की तरफ ध्यान गया। मोहतरमा शायद (या पक्का!) फेसबुक के वीडियो देखने में मशगूल थीं। वीडियो दर वीडियो खंगाले जा रहे थे। स्क्रीन तो न दीख पड़ती मगर आवाज़ का वॉल्यूम सब बयां कर रहा था। मैं मन ही मन उन मोहतरमा के बच्चों को कोस रहा था कि मान भी लें कि आपने मम्मी के फ़ोन पर फेसबुक इनस्टॉल कर दिया, वीडियो देखना भी सिखा दिया मगर यह भी तो सिखा देते कि सार्वजानिक स्थान पर वीडियो देखते समय फ़ोन की आवाज़ थोड़ी मंद कर लें। खैर! घरेलू नुस्खों, नेताओं की नौंक-झोंक से शुरू हुआ सिलसिला पुलवामा तक पहुँच गया। नेताओं की बयानबाज़ी, सेना के जौहर और जनता का आक्रोश फ़ोन की स्क्रीन से तो नहीं, फ़ोन स्पीकर्स से बाहर निकल रहा था। किसी शहीद की पार्थिव देह घर पहुँच रही थी। लोगों में जोश एवं आक्रोश ‘भारत माता की जय’ और ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारों से उन्मादी हुआ पड़ता दिख रहा था। माँ-बहनो की चीखें किसी भी आदम जात का ह्रदय क्रंदन कर जाती। यूँ तो आंटी जी की तरफ देखने का मन न था मगर देख ही लिया! आंटी जी बरबस रोये जा रही थीं। एक छोटे से रुमाल से आंसू पोंछने की कोशिश करतीं मगर हर चीखपुकार के साथ आंसुओं की एक और खेप गालों पर डेरा जमा लेती। कड़ी दर कड़ी जुड़े इन वीडियोस ने आंटी जी को हर शहीद के घर ला कर खड़ा कर दिया। वो नहीं रुकीं। न तो वीडियो रुके, न ही उनके आंसू। आस पड़ोस या जगह से अनभिज्ञ आंटी जी सब के गम में शरीक होती गयी।



TV channels से ऊपर उठ कर आज कुछ ऐसा देखा जो TV नहीं दिखा सकता था। भले ही आंटी जी के मन यह ज़ज़्बा न रहा हो कि वो भी सीमा पर जा कर लड़ें मगर उन्होंने हर एक शहीद की माँ और बहिन का दर्द महसूस किया। वो उनके साथ रोयीं। एक TV एंकर भी रोई थी, लाखों दर्शकों के आगे! मगर, यहाँ कोई दर्शक नहीं था। था भी तो एक छुपा हुआ ‘व्यक्ति’ जिसे शायद अपनी भावनाओं के सैलाब में आंटी जी ने कभी नोटिस ही नहीं किया।
पुरुष की भावनाओं का दायरा सीमित है। स्त्री अपने एक ह्रदय को असीमित व्यक्तियों एवं परिस्थितियों तक विभाजित करती है। सब के लिए दया, मोह, त्याग और अपनापन स्त्री का चरित्र है। उस महिला का वो ‘छोटा रुमाल’ शायद भीगने के ऊपर भी भीग गया होगा। उन्हें शायद एक ‘बड़े रुमाल’ की आवश्यकता थी। अमूमन पुरुष ह्रदय को ‘बड़े’ या ‘कठोर’ ह्रदय की संज्ञा दी जाती है मगर उनका रुमाल बड़ा होता है। जबकि एक ‘छोटा रुमाल’ काफी है उनके लिए या मेरे लिए। किसने चुना है एक स्त्री के लिए ‘छोटा रुमाल’?

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