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हाफ प्लेट चोमन !

आलू-छोले की एक प्लेट का ज़ायका लाजवाब था। दिन भर परात में पड़े स्टोव की मंद आंच पर कढ़ते रहते। बीच-बीच में लाला जी कड़छी से हिलाते और थोड़ा सा पानी मिलाते । परात की सजावट अदभुत थी। आधी परात में आलू का पहाड़ खड़ा रहता जो सामने की तरफ से लाल पीले रंग से रंगा जाता। उसी पहाड़ पर कटे हुए टमाटर व् प्याज़ धनिये की पत्तियों के साथ करीने से सजाये जाते। खुश्बू तो ऐसी कि कोई व्यक्ति दूकान के सामने से बिना ललचाये न जा पाए! अगर दो बार दूकान के सामने से निकल लिए तो समझो एक प्लेट पक्की। मेले में लगने वाली दुकानों में आलू-छोले की दुकानों का एक विशेष महत्व है। परात का आकार बढ़ जाता है और आलू के पहाड़ की ऊंचाई भी। दही, चटनी के बर्तन अक्सर मिटटी के होते। भल्ले, टिक्की और समोसे सजाये जाते। मेन्यू अक्सर इस प्रकार रहता : आलू छोले,चना समोसा, चना टिक्की। इन दुकानों के प्रति महिलाओं का आकर्षण देखते ही बनता। एक्स्ट्रा चटनी और मिर्ची की डिमांड न हुयी तो क्या खाक आलू-छोले खाये? चीन का आक्रमण हुआ। आलू-छोले की दूकान की खुशबू में अब वह खिंचाव न रहा। बड़ी चौड़ी सी उथली कड़ाही में बार खोंचे से नूडल्स को ठोंकते-बजाते नेपाली भीड़ पर कब्ज़ा जमा रहे हैं। बंद गोभी की बिक्री की गुंजाइश शायद अब इसी धंधे में शेष है। हमारी शान्तो चाची भी मेले में ‘चवीन’ जरूर खाएंगी। गुड्डी बुआ भी ‘चोमन’ खा कर लौटीं। समोसे का ज़ायका बदलने हेतु ‘मोमो’ ने बाजार का अधिग्रहण किया। ‘स्टीम्ड इज हैल्थी’ पंचलाइन का इज़ाद हुआ। मगर भइआ जी कब तक कच्चा मैदा पचा लेते? ‘बैक टू फ्राइड’ का यू-टर्न मारा। ‘मोमो’ को तेल में झोंक दिया। अब कम्बख्त इन चीन वालों को दर्द जरूर हुआ होगा!

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