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फीस का जूता

शाम होने को थी। गली में एक कोने पर अपनी दुकान सजा कर बैठा परसी दिन के आखिरी काम निपटाने में मशगूल था। शीघ्रता परन्तु सयम के साथ हाथ में सुई-धागा ले कर फ़टे जूते एवं चप्पलों को सिलता चला जाता। पालिश कर लेता, फीते पिरो देता। तभी एक बच्चे की आवाज़ सुन कर परसी ने अपना सिर ऊपर उठाया।
“अंकल! क्या आप मेरा यह जूता सिल देंगे अभी?”
परसी की हाँ-ना सुने बगैर ही बच्चे ने आगे बोलना शुरू किया।
“मगर मेरे पास पैसे नहीं हैं। मम्मी को पगार नहीं मिली अभी। अगर जूता नहीं सिल पाया तो मैं कल स्कूल नहीं जा पाऊंगा। “
परसी गौर से उस मासूम बालक की तरफ देख रहा था। बच्चे के चेहरे पर डर तथा आशंका के भाव स्पष्ट विदित थे। परसी ने अपना हाथ बच्चे के हाथ में पकडे हुए जूते की ओर बढ़ाते हुए धीरे से कहा:
“लाओ! पैसे नहीं लूँगा!”
“बाद में दे दूंगा।” बच्चे ने कहा।
“जरूरत नहीं!’ परसी ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा।
बच्चे का छोटा सा जूता हाथ में लेते ही परसी का मन भारी हो चला। उसे सुबह का किस्सा याद आ गया।
“पिता जी! फीस के पैसे नहीं मिले तो आज स्कूल नहीं जा पाऊंगा।” परसी के बेटे ने कहा।
“बेटा! दो दिन बारिश की वजह से दूकान न लगा पाया। आज मौसम साफ़ है। शाम तक पैसे तुम्हे मिल जायेंगे।”
परसी के समझाने पर बेटा मान तो गया मगर उदास हो गया।
परसी आज सुबह से मन ही मन अपनी कमाई की गणना कर रहा था। फीस के 120 रूपए का लक्ष्य था। बच्चे का जूता सिलते-सिलते उसे आभास था कि कुल कमाई अभी 110 रुपये ही हुयी है। अगर इस बच्चे से भी दस रुपये मिल जाते तो….! परसी परेशान हो उठा। उसका बेटा कल भी स्कूल नहीं जा पायेगा। अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखते हुए उसने बच्चे के जूते को सिला। अखबार के एक कागज़ में लपेटा और बच्चे की ओर बढ़ाते हुए बोला :
“मेरा एक बेटा तो कल स्कूल जरूर जायेगा।”
बच्चा परसी की बात न समझ पाया। वो ख़ुशी ख़ुशी जूता हवा में लहराते हुए घर की ओर दौड़ पड़ा। परसी संतोष भाव से बच्चे को भागते हुए देखता रहा।

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