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एक वार्तालाप

दफ्तर जाने का मन आज भी न हुआ था। हाँ ! रोज़ाना भी तो नहीं। रजाईयों की परतों से बमुश्किल सरकते हुए निकले। सब कुछ सुस्त सा, बिलकुल अनमने ढंग से। खैर! जाना तो था ही। सुबह सुबह सड़कों पर न जाने कितने ही लोग आते जाते, भागते हुए नज़र आते हैं। कुछ चेहरे उदास भी हैं। क्या यह सब भी बे-मन से निकले होंगे? सब भागते हैं। एक दूसरे का पीछा करते हैं। हम अनजाने में ही होड़ लगा लेते हैं। हर मनुष्य से आगे निकलने की कोशिश। हर गाड़ी ओवरटेक करने से संतुष्टि अनुभव करते हैं। हम तो ठहरे सुस्त टाइप! काहे भागें? लगे रहे इस स्कूल बस के पीछे। दो कांच की दीवारों के पीछे से ही इशारों इशारों में बातें होती रही। उन नन्ही मुस्कानों में हमारी दढ़ियल मुस्कान भी जुड़ गयी। मैंने भी पूछ ही लिया: “बे-मन से जा रहे हो?” “अंकल! कब तक बे-मन जायेंगे? जब रोज़ाना ही जाना है तो हँसते-मुस्कुराते जायेंगे!”

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