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संवाद: मैकलोड गंज की एक सुबह

शनिवार की सुबह; सर्द, धुंधली सी। मैक्लोड गंज की ढ़िठुरती रातों में कल घूमते रहे, गलियां छानते रहे। फ्राइड मोमो के स्वाद के चटखारे खूब लालची बन लेते रहे। न जाने क्या क्या खाते रहे, तुम जो थे साथ! वीकेंड में एक शुक्रवार की छुट्टी जोड़ कर समय इतना खुशनुमा गुजरेगा, मालूम न था। दिल्ली के भागम भाग में वक़्त का पता नहीं चलता। मेरठ में भी कहाँ सकून तुम्हे मिलता होगा? अच्छा किया। दिल्ली और जम्मू की शामों को मैक्लोड गंज में एक कर दिया! आज शनिवार की सुबह, सर्द, धुंधली सी और साथ तुम! बस आज की ही तो रात शेष है। कल तुम्हारी बस और मेरी बस निकल पड़ेगी हमे अपने अपने शहर छोड़ने। चलो छोड़ो! चाय पियो।

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