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कप का ब्रेक-अप

स्टील के मज़बूत गिलासों का ज़माना था। रिश्ते भी उतने मज़बूत हुआ करते थे। हाथ से छूट भी पड़ें, टूटते नहीं थे। न गिलास, न रिश्ते। घर वालों की चाय अमूमन स्टील के गिलासों में ही हुआ करती थी। मेहमानवाज़ी हर शख्स की फितरत थी। मेहमान के आते ही माँ लकड़ी वाली अलमारी टटोलती और निकाल लाती सफेद रंग के कप। ‘मेहमानों के लिए हैं ये कप!” अक्सर माँ को कहते हुए सुना था। स्टील की ट्रे में सजे कप और माँ के हलके कांपते हाथों से कांपती ट्रे में टन-टन करते कप मेहमान की ओर बढ़ते। कभी कभी यूँ लगता मानो कप आज खुद पर इतराने लगे हैं। मेहमान का रुतबा और बढ़ जाता। हमारी नज़र तो साथ में स्टील की ही प्लेट में सज रखे बिस्किट पर बार-बार चली जाती। ‘कहीं सारे ही न चट कर जाये!’ सोच कर ही मन बैठा जाता। खैर! जो कुछ मेहमान से छूटता, हमारे भाग्य का छींका फूटता।

माँ सावधानीपूर्वक कपों को मांज कर, पोंछ कर पुनः अलमारी में सजा देती। पुनः इंतज़ार शुरू किसी मेहमान के आने का! कपों को भी, माँ को भी और हमे भी! गिनकर रखे उन छः कपों ने न जाने कितने मेहमान अलंकृत किये। कप कम हुआ करते थे, मेहमान ज्यादा।

‘मोहन राकेश’ के नाटक ‘प्यालियाँ टूटती हैं ‘ में कपों के टूटने में अनिष्ट होने का मार्मिक वर्णन है। अब तो कप टूटते ही रहते हैं। पुराने टूटे और नए सज जाते हैं। घर वालों की चाय भी अब कपों में होती है। मायने बदल गए हैं। मेहमानों के होठों को चूमने वाले कप अब सिर्फ मेज़बानों के बन कर रह गए। छः के बजाय सोलह कप अब किचन की शेल्फ पर डटे रहते हैं। धूल फांकते हैं। अब मेहमान नहीं आते। कप ज्यादा हो गए हैं, मेहमान तो अब रहे नहीं!

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