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एक बटहे दो चाय!

चाय का गणित समझ न आया! बार में तो अक्सर तीस एम् एल , साठ एम् एल का हिसाब बैठाते अक्सर सुना या देखा है मगर एक बटहे दो चाय का मेजरमेंट कितना सटीक रहा होगा, मुझे संशय है। कई विशेष अवसरों पर इसे एक बटहे तीन या अक्सर एक बटहे चार होते भी सुना है। किस्सा तो मज़ेदार तब रहा जब एक मित्र चाय का लुत्फ़ लेने के लिए तत्पर बैठे थे कि हम भी जा धमके। “चाचा! चाय एक बटहे दो कर देना।” चचा जी दूसरा गिलास सीधा कर रख दिए। जब तक चाय में उबाल न आता, दो मित्र और शामिल हो चुके थे।” चाचा! चाय एक बटहे चार कर देना।” आर्डर दिया जा चुका था। चचा जी भी कम न रहे। समझ नहीं पाया कि व्यंग्य था या नसीहत, मगर जवाब लाजवाब था। “चाय तो जितनी चाहे बटहे करवा लो एतराज़ कोई न! मगर गिलास घर से लाया करो।” सही है, चचा का गिलास धोने का दर्द भला कौन समझता? यहाँ भी चाय एक बटहे दो कर दी गयी है। चचा की जेब में से झांकती माचिस आगामी कार्यवाही का संकेत दे रही है। एक घूँट चाय और एक कश बीड़ी! चार बातें इधर-उधर की हाँक कर लौट पड़ेंगे काम पर। चाय से तो पेट न भरेगा!

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