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बुजुर्ग होने की दास्तान

बूढ़े बाप का चश्मा ख़बरें कम, रिश्तेदारियां ज्यादा पढता है। तजुर्बा उम्र से नहीं, हुनर से आता है। एक बात तो सही है! उम्र ढलने के साथ नज़र बेशक कमज़ोर हो जाये, दिखता बहुत दूर का है। हर वाक्य का विश्लेषण सटीक होता है, भले ही हम क्षणिक विरोध करें। Huggies या Pampers का ज़माना नहीं था तब जब हम पायजामे में पेशाब करते थे। मात्र हमारी भाव-भंगिमाओं से हमारे गीलेपन का एहसास कर लेते थे। हमारा गीलापन हमे कम, उन्हें ज्यादा चुभता था। समय बदल गया है। वो हमारे पायजामे का गीलापन महसूस कर लेते थे जो अमूमन नीचे हुआ करता था। हम उनकी आँखों की नमी से अनजान हैं, जो अक्सर सामने हुआ करती हैं। चश्मे की जरुरत हमे है। मगर एक यक्ष प्रश्न! टाइटन प्लस का चश्मा लगा कर आँख में तो घुस जायेगा मगर क्या दिमाग में भी कुछ घुसेगा क्या?

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