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कभी आवाज़ तो दो!

मैं फिर लौट आया हूँ। कुछ तुम्हारी चुनौतियां, कुछ मेरी तुनक मिज़ाज़ी। संगम तो अच्छा नहीं है। एक ऊंचे पहाड़ पर चढ़ कर वापिस उतर आना इतना आसान भी नहीं। उतरने के मायने अक्सर गिरने के प्रयायवाची हैं। गिरना नहीं चाहता, इस लिए कह रहा हूँ कि उतर आया हूँ। जानते हो! उस जंगल का रास्ता बहुत भयानक था। दरख्तों से सटे दरख़्त, उलझी हुयी लम्बी घास, डरावनी सी लटकी हुई बेल-पत्तियां और बीच में एक पतली सी पगडण्डी। वो भी कभी कभी घास हटा कर बनानी पड़ती थी। साथ बहती नदी का उफान और उस से निकलते शोर में शायद मैं कहीं खो भी जाता, डूब भी जाता या मर ही जाता। मगर मुझे लक्ष्य के अंतिम पड़ाव पर रुकना था। इंसान की आवाज़ें महीनो भर न सुनाई दीं सिवाय गुर गुर्राते भालुओं और उड़ते हुए कुछ परिंदों की आवाज़ों के! बस सब को अपना बना कर चला। पेड़ों का दामन थाम लिया, घास से गाहे-वगाहे लिपट कर उन्हें बिस्तर बना लेता और नींद पूरी कर लेता, बेल-पत्तियों को चूस कर भूख मिटा लेता। नदी के पास के किनारे से दोनों हाथ फैला कर पानी की भीख मांग लेता। हाँ! भालुओं से जरूर नज़र चुराता रहा। पेट भरता रहा, प्यास मिटती रही और मैं चलता रहा। एक हिल स्टेशन पर घूमने का प्रोग्राम! बस इतना ही तो तय था। लड़ाई तो itinary में कहीं न थी। और ऊपर से, इस सबसे ऊंचे पहाड़ पर चढ़ने का तो कतई तय नहीं था। मगर आज विदित हुआ। इंसान अगर चुनोतियां स्वीकार कर ले तो कुछ भी नामुमकिन नहीं! बस जरूरत होगी आपके जोश और हिम्मत की। और हाँ! एक तुनक मिज़ाज़ी की!

एक पन्ना मेरी आगामी कहानी का…

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(1) Comment

  1. anil

    truly pristine…!!!

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